Feziya khan

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धीरे धीरे से भाग --- 7


कुछ दिनों बाद


शाम का समय

दीप्ती अपने घर मे बाहर बगीचे मे बैठी थी वो तो अपनी ही धुन मे एक गीत गुनगुना रही थी,,,,,,


वो गाने मे इतनी मगन थी की उसे पता ही नहीं चला की उसके पीछे कोई खड़ा हो कर उसे ही देखे जा रहा है ज़ब उसे ये एहसास हुआ की कोई है उसके पीछे तो दीप्ती ने देखा की वीर खड़ा उसे देख कर मंद मंद मुस्करा रहा है उसे लगा की ये उसका वहम है अपने सर पर मारती हुई बोली अब ये सड़ा मेरे ख्यालों मे भी आने लगा मन मे ये बोलकर मैंने अपना चेहरा घुमा लिया!


वीर की आवाज़ कानो मे पड़ी तो मैंने झट से पीछे की और देखा वो बोला मुझे नहीं पता था की तुम्हारी आवाज़ इतनी अच्छी है अच्छा गाती हो,,,,,

ये सुनते ही उसके तो होश ही उड़ गयें आवे ये क्या ये और यहाँ कैसे और क्यों मारा है यर,,,,,

वो पैर पड़कती हुई उसकी और मुड़ी और बोली क्यों तुम्हे शायद कोई गलतफहमी हो गयी है मै और अच्छा न न उसकी तरफ अपनी ऊँगली हिलाती हुई बोली किसी ने कहा था की तू सब करना पर गाना नहीं गाना नहीं तो सारे आस पड़ोस के गधे भी बाहर निकल आएंगे ज़ब मुझे उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ था पर आज हो गया!

ये कहती हुई वो घर मे आ गयी और वो बाहर खड़ा ये सोचता रह गया की दीप्ती ने उसकी तारीफ की या बुराई,,,,,,,,


रात का खाना खा कर दीप्ती बाहर घूमने निकल आई उसके पीछे पीछे वो आफत भी आ गयी जनाब को कुछ दिन का काम था तो भोपाल मे, तो पापा ने उसे घर मे ही रुकने के लिए बोल दिया था तो अब तो दीप्ती उसे झेलना ही था कुछ दिनों तक पर उसने भी ठान ली थी इस बार इसको अच्छा सा डोज दूंगी,,,,,,


उसने दीप्ती को आवाज़ दी दीप्ती रुको तो वो भी अपना सड़ा हुआ मुँह लेकर रुक गयी बोली क्या हुआ अब,,,,,,


उसने कहा तुम से कुछ बात करनी थी तो क्या कुछ देर तुम्हारे साथ चल सकता हूँ,,,,

दीप्ती ने बड़े ही बेमन से उसे हाँ तो कह दिया पर अंदर ही अंदर ये सोच रही थी अब क्या बोलने वाला है कही ये खुद ही तो मुझे शादी के लिए मना तो नहीं करने वाला मैंने अपने हाथो को खुद से ही मिलते हुए कहा वाह अगर ये बात हुई तो to good यर,,,,,


उसने बोलना शुरू किया देखो अब तुम भी जानती हो की तुम्हारे घर वालो और मेरे घर वालो के बीच मे क्या चल रहा है हम दोनों को लेकर,,,,,,,,,

दीप्ती उसकी और देखते हुए बोली हाँ जानती हूँ पर तुम बोलो क्या कहना चाहते हो,,,,,,


मन मे तो उसके आतिश बाजिया हो रही थी बिन दीवाली के ही हजारों पटाके फूट रहे थे ऐसा लग रहा था जैसे बिन मांगे मुराद पूरी हो गई हो रंग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा पर ज़ब उसने आगे बोला तो उसे थोड़ा अजीब सा लगा कुछ समझ मे नहीं आया की ऐसे भी कोई इंसान होता है दुसरो की ख़ुशी को पहले रखता है खुद से, जैसे उसकी ज़िन्दगी का मतलब ही ना हो कोई बस जी रहा है,,,,,,,


उसने उससे कहा अगर तुम्हारी लाइफ मे कोई और है तो मुझे बता देना मै शादी के लिए मना कर दूँगा तुम पर कोई उँगली भी नहीं उठाएगा बस एक बार मुझे कहना। मै नहीं चाहता की कोई अपनी खुशियों को छोड़ कर मुझ से नाता जोड़े,,,,,

उसकी बात सुन कर उसके मुँह से कुछ निकला नहीं, दीप्ती ने इतना ही कहा वैसे तो कोई नहीं है मैंने अपनी लाइफ में किसी को आने ही नहीं दिया ।

ये बोले अच्छी बात है फिर भी आराम से सोच लेना जो भी हो मुझे बता देना आखिर तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी का सवाल है सोच समझ के फैसला करना ऐसा ना हो की तुम किसी दवाव मे आकर ये बोल रही हो तुम अपने ऊपर कोई भी दबाब मत लेना मै चाहता हूँ की तुम मेरे जाने से पहले कोई फैसला कर के मुझे बता देना अगर तुम ने कुछ नहीं बोला तो मै समझ जाऊँगा की तुम्हारी ना है,,,,,,

ये बोल कर वो घर मे चला गया और वो वही खड़ी हो कर सोचती ही रह गयी की ये क्या हुआ उस पल दीप्ती की राय उसके लिए बदल गयी रिया सही बोल रही थी अच्छा इंसान है यर नहीं तो आज कल कोन कुछ पूछता है किसी लड़की से पर ये  सब से अलग है कुछ बात है बन्दे मे,,,,,

दीप्ती बेटा पांचो उंगलिया बराबर नहीं होती पर तू ने तो खुद को एक सोच मे ऐसे कैद कर लिया है उससे बाहर निकलना ही नहीं चाहती हो एक बार मौका देकर तो देखो शायद लड़को के लिए तुम्हारी सोच बदल जाए खुद को बदलो साथ नहीं तो इससे दोस्ती तो कर ही सकती हो न इतना बुरा भी नहीं है!


शाम को ज़ब वो घर आए तो उसने उससे पानी दिया चाय लाई और मुस्कुरा कर पहली बार उससे बात की,,,,,


वो बोले क्या बात है आज जनाब के कुछ अंदाज़ बदले बदले नजर आ रहे है वो मुस्कुरा कर दीप्ती को बोले कही मै तुम्हे पसंद तो नहीं आ गया न,,,,

दीप्ती ने भी थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोली ओह हैलो किसी गलतफहमी मे न जीना बात करने का ये मतलब नहीं है की तुम मे कोई सुर्खब के पँख लग गयें है वो तो मै बस अपने घर आए हुए मेहमानों को इज़्ज़त दे रही हूँ नहीं तो पुछु भी न,,,,,,


अच्छा ji,,,,,,,,,,

पर दिख तो नहीं रहा है ये मुझे कुछ और ही??????


दीप्ती बोली कुछ कहा क्या तुमने,,,,,,,,


नहीं तो कुछ भी नहीं,,,,,,,,


वो चाय पीने लग गयें और दीप्ती अपनी पढ़ाई मे इन चार दिनों मे दोनों की बीच खूब बाते हुई उनसे उसकी आदत दीप्ती को पसंद आने लगी थी एक अच्छे दोस्त के सभी गुण उस मे मौजूद थे उससे बात करती तो समय कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता,,,,,,,,,


ज़ब तक वीर उसके घर पर रहता उसे बिलकुल भी अकेला नहीं छोड़ता था , वो चाहता था जितना भी वक़्त मिले वो उसके साथ बैठे रहे और दीप्ती से बात करते रहे,,,,,,


दीप्ती सोच बदल रही थी धीरे धीरे उनके लिए उस का भी अब आए दिन जल्द ही आना जाना होने लग गया था ज़ब भी आता घर पर ही रुकता दोनों खूब बाते करते,,,,,


एक दिन की बात है वो अपने कमरे मे कुछ काम कर रहा था और दीप्ती उन्हें परेशान कर रही थी की कितना काम करोगे बहुत हो गया अब थोड़ा आराम भी कर लो वो चाहती थी की वो उससे से थोड़ी बात करें बोर हो रहीं थी वो बहुत,,,

पर वो था की काम मे लगा हुआ था तो दीप्ती ने उसका ध्यान भटकाने के इरादे से इनका पेन इनके हाथो से छीन लिया और उठ कर जाने लगी तो वीर ने दीप्ती का हाथ पकड़ लिया और बोले अब इतनी जल्दी भी क्या है और खड़े हो गया ,,,,,


दीप्ती बोली वो वो मम्मी बुला रही है अभी आई अच्छा और जैसे मुड़ी वीर ने दीप्ती को  अपनी तरफ बहुत जोर से खींचा दीप्ती इनके सीने से जा कर लगती इससे पहले ही उसने अपने कदम दूसरी और कर लिए जिससे वो उसके साइड से हो कर दीवार की तरफ हो गयी।


ये क्या वीर ने तो दीप्ती के मन पर फिर से वार किया बड़ी मुश्किल से तो उसने खुद को वीर को समझने के लिए राजी किया था अब क्या करें दीप्ती?????





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2 Comments

madhura

16-Aug-2023 09:22 PM

Nice

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Abhilasha Deshpande

16-Aug-2023 12:44 PM

Nice

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